मलेरिया के लक्षण - Malaria ke lakshan

मलेरिया ज्वर अनियमित रूप से तथा अनियमित काल के लिए आता है. चूंकि इस ज्वर का वेग विषम होता है इसलिए इसे 'विषम ज्वर' के नाम से भी जाना जाता है. मलेरिया के लक्षण से पहले थोड़ा समझ लें कि आखिर मलेरिया क्या है और कैसे होता है?

Malaria ke lakshan
Malaria ke lakshan


मलेरिया क्या है? 


मलेरिया एक तरह का संक्रमण रोग है जो मच्चरों की एक विशेष जाति का 'एनाफिलिज' नामक मच्छर के काटने की वजह से होता है . 'एनाफिलीज' प्रजाति का मादा मच्छर प्लासमोडियम (plasmodium) नामक परिजीवी का वाहक होता है. इस जाति के मादा मच्चर के काटने के दुष्परिणाम स्वरुप प्लासमोडियम नामक परिजीवी मनुष्य के रक्त में प्रवेश कर जाता है जिससे व्यक्ति मलेरिया का शिकार हो जाता है.

मलेरिया वाहक मच्चर जब किसी स्वस्थ मनुष्य को काटता है तो दंशित स्थान पर मच्चर के मुख की लार के साथ मलेरिया के जीवाणु निकलकर मनुष्य के खून में प्रवाहित होकर जिगर की कोशिकाओं में पहुँचते है और वहां 6 से 9 दिन तक पोषण प्राप्त करते है. यही मलेरिया का संचयकाल है अर्थात उक्त मच्चर के काटने के बाद 6 से 9 दिन के पश्चात मलेरिया होता है. इस ज्वर में तापमान अनियमित होता है. पीड़ित रोगी के शरीर का तापमान कभी कम हो जाता है और कभी बढ़ जाता है.

मलेरिया के लक्षण 


मलेरिया की नीचे लिखी तीन अवस्थाएं होती है जिनमें अलग-अलग लक्षण दिखाई देते है. इन सभी के लक्षणों को समझकर मलेरिया की पहचान की जा सकती है

1. शीतावस्था 

शीतावस्था अर्थात रोगी को सर्दी (ठंड) लगना मलेरिया का पहला और प्रमुख लक्षण है. यह अवस्था 30 मिनट से एक घंटे तक रहती है. कई बार तो रोगी को इतनी ठंड लगती है कि उसके दाँत किटकिटाने लगते है और कई रजाईया और कंबल उसे ओढ़ा देने पर भी ठंड लगती है जबकि रोगी का शरीर स्पर्श में गर्म महसूस होता है. रोगी ठंड के कारण बुरी तरह कांपता है. उसका जी मिचलाने लगता है और कभी कभी उल्टियां भी आने लगती है.

2. उष्मावस्था

यह अवस्था 3 से 4 घंटे तक रहती है. इस अवस्था में रोगी को अत्यंत गर्मी लगती है. तापमान 103 फॉरेनहाईट तक पहुँच जाता है. सिर में दर्द होने लगता है तथा कभी कभी इस अवस्था में रोगी प्रलाप करने लगता है.

3. प्रस्वेदावस्था

इस अवस्था में सर्वप्रथम रोगी के मुँह व मस्तिष्क पर पसीने की बूंदे निकलती है. उसके बाद सारे शरीर पर पसीना आने लगता है. जिससे रोगी के कपड़े तर-बतर हो जाते है. पसीना आने के कारण रोगी को थकान होने लगती है. पेशाब गहरे लाल रंग का आ सकता है. बुखार उतरने के बाद रोगी दुर्बलता अर्थात कमज़ोरी का अनुभव करता है. प्राय: उसे नींद आ जाती है और जागने पर वह स्वयं को स्वस्थ महसूस करता है.

इस प्रकार बुखार, कंपकपी होना और पसीना आना इन तीन लक्षणों के आधार पर तथा यदि किसी को बुखार तो हो लेकिन दाने, पेचिस तथा खांसी की शिकायत न हो तो यह मलेरिया वाले बुखार का पक्का परिचायक है.

मलेरिया के अन्य लक्षण 


मलेरिया में निम्नलिखित लक्षण भी देखने को मिलते हैं जिनसे मलेरिया की पहचान की जा सकती है-

एनीमिया:- मलेरिया के जीवाणु खून में प्रवेश करने के बाद खून की लाल कोशिकाओं को नष्ट करना शुरू कर देते है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति के शरीर में खून की कमी हो जाती है. खून की कमी होने से चक्कर आना, कमज़ोरी महसूस होना, सांस फूलना आदि जैसे लक्षण भी दिखाई देने लगते है.

इसके अतिरिक्त मुख का स्वाद कड़वा होना, सिरदर्द, आँखों में लालिमा, जीभ का ऊपरी भाग सफेद होना, सर्दी लगना, कभी कभी उल्टी व मिचली होना आदि जैसे लक्षण मलेरिया के रोगी में दिखाई देते है.

मलेरिया से कैसे बचे 


1. मलेरिया के ज्वर से बचाव हेतु यह आवश्यक है कि रहने के स्थानों के पास लोग स्थिर तथा धीमी गति से बहने वाले नालियों आदि के पानी को घरों के पास जमा ना होने दें तथा लोग अपने आप को (विशेषकर शाम के समय) मच्छरों से बचाए.

2. घर में भी पानी जमा ना होने दें खासकर घर में पड़े हुए टायर, कूलर आदि से नियिमत रूप से पानी निकालते रहें.

3. भारत के ज्यादातर हिस्सों में गर्मियों के मौसम में मच्छर पाया जाता है इसलिए जब मच्छर हो तब जहाँ तक संभव हो मच्छरदानियों का उपयोग किया जाना चाहिए.

3. सरकारी अस्पतालों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा छिड़काव तथा लार्वा नष्ट करने के कार्य में अपना पूर्ण सहयोग दें तथा छिड़काव करने वाले सेहत कर्मियों को लोग अपने घरों में भी छिड़काव करने को कहें. छिड़काव के समय सारा फर्नीचर चादरों से ढ़क दें और खाने की चीजों को अलमारी के अंदर रख दें अथवा भली प्रकार से ढ़क दें. छिड़काव करते समय पालतू पशु-पक्षियों को घर से बाहर कर दें.

मलेरिया की अंग्रेजी दवा 


सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्ताओं द्वारा मलेरिया बुखार के मामलों में संभावित इलाज हेतु क्लोरोक्वीन गोलियों का सेवन करने की सलाह दी जाती है. यह गोली प्राय: 150 मि.ग्रा की होती है इसकी खुराक आयु के आधार अलग-अलग मात्रा में दी जाती है.

यदि मलेरिया के मरीज़ की आयु 0-1 वर्ष हो तो 150 मि.ग्रा वाली आधी गोली दी जाती है अर्थात मरीज को 75 मि.ग्रा क्लोरोक्वीन खाने की सलाह दी जाती है. इसी तरह अगर रोगी की आयु 1-4 वर्ष हो तो 1 गोली (150 मि.ग्रा), 4-8 वर्ष हो तो दो गोलियां (300 मि.ग्रा), 8-12 वर्ष हो तो 3 गोलियां (450 मि.ग्रा) और 13 साल से अधिक हो तो 4 गोलियां अर्थात 600 मि.ग्रा खाने की सलाह दी जाती है.

मेलरिया का घरेलू उपचार 


1. विषम ज्वर उतर जाने के बाद 11 नग काली मिर्च चबा लेने से बुखार नहीं आता है.

2. तीन माशा काला जीरा और 10 ग्राम गुड़ भली प्रकार मिलाकर दिन में चार बार 2-2 घंटे के अंतराल पर सेवन करने से मलेरिया ज्वर ठीक हो जाता है.

3. आधे नींबू के रस में 4 चम्मच जल व शक्कर मिलाकर दिन में 2-3 बार निरंतर 3-4 दिन सेवन करने से मलेरिया ज्वर ठीक हो जाता है.

4. जवाखार और पीपल का चूर्ण 3-3 ग्राम को 6 माशा गुड़ में मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से मलेरिया ठीक हो जाता है.

5. 2 ग्राम कपूर में 10 ग्राम गुड़ को कूटकर 12 गोलियां बना लें. यह 1-1 गोली दिन में 3 बार सेवन करने से शीत ज्वर व तिजारी ठीक होती है लेकिन बच्चों को आधी गोली ही खिलाई जानी चाहिए.

निष्कर्ष


यदि ठीक समय पर मलेरिया का उपचार न किया जाए तो इससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है इसलिए जब भी किसी व्यक्ति में ऊपर बताए गए मलेरिया के लक्षण दिखाई देने लगें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाकर इलाज शुरू कर देना चाहिए। उम्मीद है आपको मलेरिया से जुडी जानकारी अच्छी लगी होगी।




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