भगन्दर का ईलाज - Bhagandar ka ilaj

आज के इस उल्लेख में हम आपको भगन्दर का ईलाज बताने वाले है लेकिन इस बीमारी के ईलाज से पहले आपको इस रोग की पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है तो चलिए भगन्दर का ईलाज जानने से पहले समझते है भगन्दर क्या होता है?

Bhagandar ka ilaj



भगन्दर क्या है? 


पंडित भावमिश्र जी 'भाव प्रकाश' में लिखते है कि गुदा की बाजू में दो अंगुल के बीच में पीड़ा करने वाली और फ़टी हुई जो पीड़िका अथवा फुंसी होती है उसको "भगन्दर" कहते हैं. "आयुर्वेदाचार्य भोज" का कथन है  चूंकि यह गुदा और मूत्राशय को चारों और से योनि की तरह फोड़ देता है, इसलिए इस रोग को भगन्दर कहते है. सरल शब्दों में, गुदा की बाजू में दो अंगुल पर एक फुंसी होती है, उसमें बहुत वेदना होती है. जब वह फट जाती है तब उसे भगन्दर कहते हैं. इस प्रकार गुदा की दो अंगुल की दूरी के स्थान में नासूर की तरह एक प्रकार का घाव हो जाता है. 

कुपित वातादिक दोषों से पहले गुदा की दो अंगुल की दूरी पर व्रण-शोथ उत्पन्न होता है. जब वह पक कर फैल जाता है तब उसमें से लाल रंग की झाग और पीप आदि बहते है. घाव बढ़ जाने पर उसमें से मल मूत्र आदि निकलते है. यह भगन्दर जब अपथ्य सेवन करने से बिगड़ जाता है, तब उस स्थान पर सुराख हो जाता है. फिर उस भगन्दर से कभी मल और कभी मूत्र निकलता रहते है. गुदा प्रवेश में किसी प्रकार का फोड़ा होकर पकने पर वह भी क्रमशः भगन्दर हो जाता है. 

भगन्दर के शुरुआती लक्षण 


जिस रोगी को भगंदर रोग होने वाला होता है उसकी कमर और हड्डियों में सुई चुभोने के सदृश दर्द होता है. इसके अतिरिक्त जलन खुजली और वेदना आदि उपद्रव होते है.भगन्दर का ईलाज जानने से पहले आपको इसके प्रकार और लक्षण समझ लेने चाहिए तांकि भगन्दर की पहचान करके आप सही औषदि का चयन कर सके.  

भगन्दर के प्रकार और उनके लक्षण 


भगन्दर मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है जो इस प्रकार है ---

1. वातजशतपोनक भगंदर के लक्षण

कसैले व रूखे पदार्थों से कुपित हुई वायु, गुदा प्रवेश में एक फुंसी उत्पन्न करती है. उस फुंसी की उपेक्षा करने से वह फुंसी पक जाती है, उसमें घोर वेदना होती है. उस फुंसी के फूटने से लाल झागदार पीप बहती है, फिर उसमें अनेक छेद हो जाते है. उन छेदों से मल, मूत्र और वीर्य बहने लगते हैं. इसको "शतपोनक" (संस्कृत भाषा में शतपोनक का अर्थ है - "चलनी". इस भगंदर में चलनी के सामान छेद हो जाते है. इसलिए इसको शतपोनक कहा जाता है.) भगंदर के नाम से जाना जाता है. 

2. पित्त उष्ट्रग्रीव भगंदर के लक्षण 

अत्यंत पित्तकारक पदार्थों का सेवन करने से कुपित हुआ पित्त गुदा प्रवेश में लाल रंग की फुंसी उत्पन्न करता है. वह फुंसी शीघ्र ही पक जाती है. फूटने पर उसमें से गर्म दुर्गन्धित पीप बहने लगती है. यह भगंदर उष्ट = ऊँट + ग्रीव = गर्दन अर्थत ऊँट की सी गर्दन वाला होता है. इसलिए इसको उष्टग्रीव अथवा शिरोधर कहते हैं. 

3. श्लैष्मिक परिश्रावी भगंदर के लक्षण 

कफ के संयोग से सफेद रंग की फुंसी होती है. उसमें खुजली बहुत चलती है.फूटने पर उस फुंसी से गाढ़ी गाढ़ी राध निरंतर बहती है. इस भगंदर में पीड़ा कम होती है इसको "परिश्रावी भगंदर" कहते है. 
(परिश्रावी का अर्थ है- मवाद बहाने वाला. कफज भगंदर होने से राध/मवाद दिन-रात बहा करती है इसी से इसको "परिश्रावी" भगंदर कहा जाता है. 

4. त्रिदोषज शम्बूकावत्त भगंदर के लक्षण 

अनेक प्रकार के रंग, अनेक प्रकार की पीड़ा तथा एक प्रकार की स्त्राव वाली गाय के स्तनों के समान फुंसी उत्पन्न होती है. उसका स्रावक मार्ग शम्बूक के आवर्त्त के सदृश होता है. इसीलिए इसको "शम्बूकावत्त" भगंदर कहते है. 

(शम्बूक = शंख और आवृत्त = चक्कर. जिस फुंसी की मवाद निकलने का मार्ग/राह शंख के आवृत्त अर्थात चक्कर जैसा होता है. उसे "शम्बूकावत्त" भगंदर कहते है. 

5. शल्य सम्बंधी उन्मार्गी भगन्दर के लक्षण 

गुदा के पास कांटा आदि लगने से अथवा नाखून आदि के खुजलाने से फोड़ा उत्पन्न हो जाता है, वह बढ़ता और फूटता है. उसकी उपेक्षा करने से उसकी शीघ्र ही समुचित चिकित्सा ना करने से उसमें कीड़े पड़ जाते है.वे कीड़े त्वचा, मांस आदि को विदीर्ण करके अनेक मुँह वाले अनेक व्रण उत्पन्न कर देते हैं. ऐसे भगन्दर को शल्य सम्बन्धी "उन्मार्गी भगन्दर" कहते है. 

इन वर्णों की तिरछे मार्गों/राहों से विष्टा आदि निकला करते है. इसलिए इस भगन्दर को "उन्नमार्गी भगन्दर" कहा जाता है और शल्य सम्बन्धी इसलिए कहते है क्योंकि यह शल्य यानि कोटा आदि लगने से पैदा होता है. 

भगन्दर रोग-साध्य साध्यता 

समस्त प्रकार के भगन्दर भयंकर और कष्टदायक होते हैं. इनमें से त्रिदोशज-शम्बूकावृत्त और शल्यउन्मार्गी असाध्य है. जिस रोगी के भगन्दर से वायु, मूत्र, विष्ठा, वीर्य और कीड़े निकलते हैं वह मर ही जाता है.

भगन्दर का ईलाज 


1. भगन्दर के पकने से पहले ही समुचित चिकित्सा करनी चाहिए अन्यथा वह कष्टसाध्य हो जाती है. चिकित्सक को चाहिए की वो गांठ या फुंसी को किसी भी स्थिति में पकने ना दे, ऐसी चिकित्सा करनी चाहिए, जिससे रोगी की वो गांठ या फुंसी बैठ जाये. फुंसी या गांठ की कच्चे रहने की स्थिति में रक्त मोक्षण यानि रक्त निकालना ही उसकी प्रधान चिकित्सा है. 

2. फोड़ा बैठाने के उपाय/नुस्खे इस रोग में भी हितकारी हैं.

3. वमन, विरेचन, रक्त स्त्राव (खून निकलना), परिषेक (तरड़े) और अनेक प्रकार के लेपों से इस रोग की चिकित्सा-फुंसी के ना पकने की स्थिति में करनी चाहिए तांकि फुंसी पकने ना पाए. 

4. जब फुंसी बैठने की उम्मीद ना हो तो उसको व्रण शोथ की चिकित्सा के अनुसार पकाकर उसका मवाद निकाल देना चाहिए अथवा विसंक्रमित नशतर द्वारा चीरकर मवाद निकाल देना चाहिए. जहाँ पर घाव हो जाए उसकी 'नासूर' की तरह चिकित्सा करनी चाहिए (जैसे सेंहुंड के दूध, आक के दूध और दारू हल्दी की बत्ती बनाकर घाव में रखनी चाहिए तांकि घाव भर जाये.)

यदि भगन्दर का व्रण सूख भी गया हो तब भी भगन्दर वाले रोगी को एक वर्ष तक दण्ड कसरत, स्त्री समागम/मैथुन, घोड़े, हाथी आदि की सवारी अथवा भारी अन्न के भोजन से परहेज रखना चाहिए. 

आयुर्वेदिक दवाईयों से भगन्दर का ईलाज 


भगन्दर का ईलाज करने के लिए कई कुछ आयुर्वेदिक दवाईयां उपलब्ध है जो आपको मेडिकल स्टोर से भी मिल सकती है. 

1. केपाइना टेबलेट (निर्माता हिमालय ड्रग) - यह गोली आवश्यकतानुसार 2-3 गोली दिन में 2-3 बार सेवन करायें. 

2. करामाती टेबलेट (निर्माता राजवैध शीतल प्रसाद) :- यह 1-2 गोली दिन में 3-4 बार रोगी को सेवन करायें. 

3. चोबचीनी इंजेक्शन (निर्माता मिश्रा बुंदेलखंड) - यह टीका मरीज को 1-2 मि.ली. त्वचा या मासपेशी में लगायें. 

4. स्वर्णक्षीरी इन्जेक्शन (निर्माता सिद्धि मिश्रा बुंदेलखंड): यह 2 मि.ली. प्रतिदिन या आवश्यकतानुसार मासपेशी या शिरा में इन्जेक्शन लगायें. 

भगन्दर का ईलाज करने हेतु शास्त्रोकत औषदियां 


भगन्दर का ईलाज करने के लिए बहुत किस्म की शास्त्रोकत औषदियां उपलब्ध है, जो इस प्रकार है --

निशाद्या तेल, निस्पन्दन तेल, करवीराध्य तेल, जात्यादि तेल, जात्यादि घृत, कासीसाध्य घृत, त्रिफलादि मोदक, त्रिफला गुग्गल, कांचनार गुग्गल, वृहतसुरण वटक, विंडंगारिष्ट, भगन्दर रस, चित्र विभाण्डक रस, नारायण रस, नवकार्षिक गुग्गल, खदिरादि क्वाथ, विडंगादि क्वाथ, विडंगादि चूर्ण, करवीरादि तेल और ताम्रभस्म (सन्दर्भ ग्रन्थ-भैषज्य रतनावली) का प्रयोग अत्यंत हितकारी है. 

भगन्दर का ईलाज करने के लिए सरल एवं सफल घरेलु आयुर्वेदिक प्रयोग 


1. भगन्दर की अपक्व फुंसी पर सोंठ, गिलोय, पुननरवा, बड़ के पत्ते और पानी के भीतर की ईंट-प्रत्येक समान भाग लेकर, पीस कर लेप करने से भगन्दर की फुंसी बैठ जाती है. 

2. गिलोय,सोंठ, पुननरवा, मुलहठी और बेरी के पत्ते-प्रत्येक समान मात्रा में लेकर बारीक पीसकर तथा गर्म करके गांठ पर बाँधने से गांठ बैठ जाती है. 

3. एलुआ और अफीम 6-6 ग्राम तथा मुनक्का 2 ग्राम इसको जल के साथ सिल पत्थर पर पीसकर व टिकिया बनाकर गांठ पर बाँधने से भगन्दर की गांठ बैठ जाती है. 

भगन्दर का ईलाज करने हेतु हित-अहितकारी आहार-विहार 


विपरीत स्वाभाव के अन्न और पान, विषम भोजन, धूप में घूमना फिरना, कसरत, कुश्ती, मैथुन, लड़ाई, किसी जानवर की पीठ पर चढ़ना, साईकल-मोटरसाईकल आदि वाहन चलाना, भारी पदार्थ खाना ये सभी भगन्दर का घाव भर जाने के बाद भी एक वर्ष तक नहीं करने चाहिए क्योंकि भगन्दर के रोगी के लिए यह सब करना ख़तरनाक हो सकता है. 

बिना पके भगन्दर में संशोदन, जुलाब, लेप करना, फस्द खोलना हितकारी है.

पके भगन्दर में यथोचित रीतिनुसार शस्त्रकर्म व क्षार कर्म करने चाहिए. 

समस्त प्रकार के शालि चावल, मुंग, जंगली पशु-पक्षियों के मास का रस, परवल, सहंजना, तिल का तेल, छोटी मूली, सरसों का तेल, तिक्त पदार्थ, गाय का घी व शहद, यह सभी दोष विचारानुसार पथ्य हैं अर्थत इन्हें खुराक में शामिल किया जा सकता है. 

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